बात 10 मई, 2023 की है. गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) के एडीशनल डीसीपी शक्ति मोहन अवस्थी अपने औफिस में बैठे एक फाइल को देख रहे थे, तभी उन के कमरे में पत्रकार संदीप कुमार पहुंचे. वह नोएडा फिल्म सिटी सेक्टर-10 में स्थित एक मीडिया संस्थान से जुड़े थे. पत्रकार को देखते ही उन्होंने अपने सामने रखी फाइल को एक तरफ सरका कर मुसकराते हुए कहा, “आइए संदीपजी.”
उन से हाथ मिलाने के बाद संदीप कुमार कुरसी पर बैठ गए तो एडिशनल डीसीपी बोले, “क्या लेंगे चाय या कौफी और आज हमारी कैसे याद आ गई?”
“बस सर, एक गिलास पानी पिलवा दीजिए. एक मुसीबत में पड़ गया हूं इसीलिए आप की मदद लेने के लिए आना पड़ा.”
“ऐसी क्या प्राब्लम आ गई संदीपजी, आप लोग तो दूसरों की मदद करते हो. ऐसी कौन सी परेशानी है, जिस के लिए हमारी मदद की जरूरत पड़ गई.” एडीसीपी शक्ति मोहन ने कहा.
“सर, प्राब्लम तो बहुत छोटी सी थी, लेकिन अब बड़ी हो गई है…”
संदीप कुमार ने एडिशनल डीसीपी से मुलाकात कर के जो कुछ बताया, उसे सुन कर अवस्थी के कान खड़े हो गए. उन्होंने उसी वक्त सेक्टर-20 थाने के एसएचओ मनोज कुमार सिंह को फोन कर के कुछ दिशानिर्देश दिए और इस मामले की जांच के लिए विशेष टीम गठित करने का आदेश दिया.
दरअसल ये मामला ही ऐसा था. संदीप कुमार का पैन कार्ड कुछ समय पहले कहीं गिर गया था. इस मामले में उन्होंने पैन कार्ड गुम होने की रिपोर्ट दर्ज कर डुप्लीकेट कार्ड तो बनवा लिया, लेकिन इस दौरान उन्हें पता चला कि उन के पैन कार्ड का इस्तेमाल कर 2 फरजी कंपनियां चलाई जा रही हैं.
एक कंपनी पंजाब के लुधियाना में और दूसरी महाराष्ट्र के सोलापुर में चलाई जा रही है. उन के पास कोई ऐसी अथौरिटी तो थी नहीं कि वे आगे की जांच कर पाते कि वे कंपनियां किस की हैं और उन में क्या चल रहा है. लिहाजा उन्होंने इसी की शिकायत के लिए एडीसीपी शक्ति मोहन अवस्थी से मदद मांगी थी.
टीमों में बंटे हुए थे घोटालेबाज
एडीसीपी के निर्देश पर थाना सेक्टर-20 में शिकायत कर के मामले की जांचपड़ताल शुरू कर दी गई. एसीपी (नोएडा सेंट्रल) रजनीश वर्मा की निगरानी में नोएडा सेक्टर-20 थाने के एसएचओ मनोज कुमार सिंह ने साइबर एक्सपर्ट के साथ आर्थिक और जालसाजी से जुड़े अपराधों की जांच में महारथ हासिल करने वाले पुलिसकर्मियों की टीम तैयार की.
इस टीम ने अपने काम की शुरुआत की रजिस्ट्रार औफ कंपनीज के डाटा खंगालने से. सब से पहले उन 2 कंपनियों का डाटा हासिल किया गया, जो संदीप सिंह के पैन कार्ड पर बनी थी और लुधियाना व सोलापुर में थी. पुलिस की एक टीम इन दोनों पतों पर पहुंची तो जानकारी मिली कि इन दोनों पतों पर कोई कंपनी या उस का दफ्तर ही नहीं है.
इस जानकारी के सामने आते ही पुलिस के कान खडे हो गए और इन कंपनियों का पूरा डाटा, आर्थिक लेनदेन की जानकारी बैंकों और संबंधित विभागों से निकाली गई. जल्द ही पुलिस के सामने वे नाम और बैंक खाते भी आ गए, जिन में इन दोनों कंपनियों के नाम से कागजी लेनदेन तो हो रहे थे, मगर इस कंपनी को चलाने वाले और उन के द्वारा संचालित किए जा रहे बैंक खातों को खंगाला गया तो धीरेधीरे कडिय़ां जुडऩी शुरू हो गईं.
करीब 20 दिनों तक पुलिस की कई टीमें अलगअलग विभागों से दस्तावेज हासिल कर जांच को आगे बढ़ाती रहीं. पुलिस के पास इस दौरान इतनी जानकारी एकत्र हो चुकी थी कि अब आगे बढऩे से पहले उन लोगों को दबोचना जरूरी था, जिन का चेहरा इस गोरखधंधे में सामने आ चुका था. एसएचओ मनोज कुमार सिंह और एसीपी रमेश चंद्र पांडे ने एडीशनल डीसीपी शक्ति मोहन और डीसीपी हरीश चंद्र को यह बात बताई.
डीसीपी हरीश चंद्र के सामने जो जानकारी थी, वो ऐसी थी कि उस पर पुलिस एक्शन की शुरुआत तो कर सकते थी, लेकिन उस की जांच को मुकाम पर पहुंचाने के लिए न जाने कितने विभागों के सहयोग की जरूरत पड़ेगी. लेकिन इस पूरे गोरखधंधे से मुंह भी तो नहीं फेरा जा सकता था. लिहाजा उन्होंने गौतमबुद्ध नगर पुलिस कमिश्नरेट की मुखिया पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह के सामने पेश हो कर इस पूरे मामले की जानकारी दी.
पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह का नाम पुलिस के उन अधिकारियों में शुमार हैं, जो बड़े से बड़े कठोर फैसले लेने के लिए जानी जाती हैं. पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह को जैसे ही फरजी कंपनियों के इस रैकेट की जानकारी मिली उन्होंने सेंट्रल नोएडा जोन के डीसीपी हरीश चंद्र, एडीशनल डीसीपी शक्ति मोहन अवस्थी, एसीपी रजनीश वर्मा और एसएचओ सेक्टर-20 मनोज कुमार सिंह को अपने औफिस में बुला कर उन की ब्रीफिंग की. उन्होंने अधिकारियों को हिदायत दी कि कई टीमें बना कर इन सभी कंपनियों पर एक साथ काररवाई की जाए.
पुलिस आयुक्त की तरफ से हरी झंडी मिल चुकी थी सबूत पहले ही एकत्र हो चुके थे, टीमें तैयार होने में ज्यादा देर नहीं लगी.
डेढ़ दरजन टीमों ने की विभिन्न शहरों में छापेमारी
2 जून, 2023 नोएडा के सेक्टर-20 थाने से पुलिस की करीब डेढ़ दरजन पुलिस टीमें एक साथ नोएडा ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद व दिल्ली की अलगअलग लोकेशन के लिए निकलीं. पूरे एनसीआर में पुलिस की टीमों ने छापेमारी की. पुलिस ने कुल 8 लोगों को पकड़ा. जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया, उन में दिल्ली के रहने वाले दीपक मुरजानी और उस की सीए पत्नी विनीता मुरजानी सब से प्रमुख थे. इन के अलावा यासीन शेख दूसरा प्रमुख व्यक्ति था.
उस के अलावा 5 अन्य लोगों में साहिबाबाद के आकाश सैनी, हाथरस के अतुल सेंगर, नोएडा की अवनी, दिल्ली के ही विशाल और राजीव को दिल्ली के मधु विहार स्थित उन के कार्यालय से गिरफ्तार किया गया. इन सभी लोगों के घर व औफिसों की तलाशी में जो भी दस्तावेज और बैंक के खातों की डिटेल मिली, उन्हें जब्त कर लिया गया.
पुलिस की जांचपड़ताल और पूछताछ के बाद देश में जीएसटी रिफंड के जरिए साइबर अपराध के एक ऐसे खेल का खुलासा हुआ, जिस से सरकार को अब तक 15 हजार करोड़ रुपए की चपत लगाई जा चुकी है. पुलिस ने इस से पहले कभी भी आर्थिक अपराध के ऐसे साइबर मामले का खुलासा नहीं किया था. पूछताछ में खुलासा हुआ कि 15 हजार करोड़ रुपए के इस महाघोटाले में शामिल करीब 3 हजार फरजी फर्म ‘कागजी’यानी शेल कंपनियां थीं. जो लोग पकड़े गए, उन से 6 लाख 35 हजार लोगों के पैन कार्ड का डाटा मिला था, जिस से ये कंपनी रजिस्टर्ड कराते थे.
फरजी कंपनी बना कर ये गिरोह सरकार को चूना लगाता था. फरजी बिल का उपयोग कर जीएसटी रिफंड आईटीसी (इनपुट टैक्स क्रेडिट) के रूप में सरकार से करोड़ों रुपए प्राप्त कर लिए जाते थे. इस तरह हर कंपनी के लिए हर महीने 2-3 करोड़ रुपए का ई-बिल जेनरेट करते थे. इस तरह इन लोगों ने पिछले डेढ़ साल में करीब 15 हजार करोड़ रुपए का चूना लगाया.
नोएडा सेक्टर-20 थाना पुलिस ने पत्रकार संदीप कुमार की शिकायत पर आधारित मुकदमे को जालसाजी, साइबर अपराध, अमानत में खयानत, चोरी और ठगी की संगीन धाराओं में परिवर्तित कर सभी आरोपियों से कड़ी पूछताछ शुरू कर दी. जिस के बाद हैरान कर देने वाले एक घोटाले की कहानी सामने आई—
गैंग के सभी सदस्यों के बंटे हुए थे काम
जीएसटी रैकेट के इस गड़बड़ घोटाले की कहानी को पूरा समझने के लिए पहले उन किरदारों के बारे में जानना जरूरी है, जो इस घोटाले को अंजाम दे रहे थे. उन का क्या काम था और वे कैसे इस पूरे औपरेशन को अंजाम देते थे.
संदीप मुरजानी नाम का शख्स इस पूरे रैकेट का मास्टरमाइंड है. यह गैंग को संचालित करता था. इस पूरे रैकेट को 2 टीमें मिल कर अंजाम देती थीं. संदीप मुरजानी पहली टीम का लीडर होता था. वह फरजी दस्तावेज, आधार कार्ड, पैन कार्ड, रेंट एग्रीमेंट, इलेक्ट्रिसिटी बिल आदि की व्यवस्था कर के उन से फरजी फर्म और जीएसटी नंबर तैयार कराता था.
तैयार की गई फरजी फर्म को बेचने के लिए क्लाइंट तलाश करने का काम दूसरी टीम करती थी. वह मोटी रकम ले कर फर्म बेच देता था. इन फर्मों में फरजी पैन कार्ड लिंक होते थे और उस पैन कार्ड से जीएसटी नंबर बनाए जाते थे.