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उत्तर प्रदेश के जिला एटा के थाना नया गांव के तहत आता है एक गांव असदपुर, जहां रामनिवास  लोधी अपने 3 बेटों, मुखराम, अनिल और भूप सिंह के साथ रहते थे. रामनिवास की खेती की कुछ जमीन थी, उसी से वह परिवार का भरणपोषण करते थे. मुखराम जब जवान और समझदार हुआ तो वह घर की आमदनी बढ़ाने के उपाय खोजने लगा.

उस के गांव के कई लड़के दिल्ली में नौकरी करते थे, वे काफी खुशहाल थे. दिल्ली जाने के बारे में उस ने भी पिता से बात की और अपने एक दोस्त के साथ दिल्ली चला गया. कुछ दिन वह दोस्त के यहां रहा. उसी के सहयोग से उसे एक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई. बाद में वह दिल्ली के नंदनगरी इलाके में किराए का कमरा ले कर अकेला रहने लगा.

नौकरी करने के बाद मुखराम को फैक्ट्री से जो तनख्वाह मिलती थी, उस में से वह अपने खर्चे के पैसे रख कर बाकी पैसे घर भेज देता था. इस से घर के आर्थिक हालात सुधरने लगे. पैसा आया तो मुखराम बनठन कर रहने लगा. उस की शादी के लिए रिश्ते भी आने लगे. घर वालों को एटा की ही रजनी पसंद आ गई. बातचीत के बाद मुखराम की रजनी से शादी हो गई. शादी के कुछ दिनों बाद मुखराम रजनी को दिल्ली ले आया. इस तरह उन की जिंदगी हंसीखुशी से कटने लगी.

भाई को देख कर अनिल ने भी गांव की संकुचित सीमा से निकल कर दिल्ली के खुले आकाश में सांस लेने का फैसला कर लिया. एक दिन वह भी बड़े भाई मुखराम के साथ दिल्ली चला गया. भाई ने उस की भी नौकरी लगवा दी.

दोनों भाई साथ रह रहे थे, इसलिए घर वाले उन की तरफ से बेफिक्र थे. अनिल को भी दिल्ली की जिंदगी रास आ गई थी. दोनों भाई 2-4 दिनों के लिए छुट्टियों पर ही घर जाते थे. घर पर उन का छोटा भाई भूप सिंह ही रह गया था. वह पिता के साथ खेती करता था. अनिल भी कमाने लगा तो रामनिवास उस के लिए भी लड़की तलाशने लगा.

एक रिश्तेदार के जरिए फर्रुखाबाद जिले के गांव रहीसेपुर के रहने वाले सुरेश की बेटी पुष्पा का रिश्ता अनिल के लिए आया तो रामनिवास ने उस की भी शादी पुष्पा से कर दी. यह करीब 5 साल पहले की बात है. कुछ दिनों बाद पुष्पा भी अनिल के साथ दिल्ली आ गई. दोनों भाई एक ही कमरे में रहते थे. पुष्पा को यह अच्छा नहीं लगता था.

अनिल ने पुष्पा को समझाया कि महानगर की जिंदगी ऐसी ही होती है. आदमी को हालात से समझौता करना पड़ता है. पुष्पा का दिल्ली में मन लग जाए, इस के लिए अनिल ने पुष्पा को दिल्ली में खूब घुमायाफिराया. पुष्पा के लिए यह बिलकुल नया अनुभव था. उसे अच्छा तो लगा, लेकिन किराए के छोटे से कमरे में उस का मन नहीं लगा तो अनिल उसे गांव छोड़ आया.

उस बीच अनिल का छोटा भाई भूप सिंह भी अपने भाइयों के पास दिल्ली आ गया. अनिल दिल्ली में था और पुष्पा गांव में सासससुर के पास. नईनवेली दुलहन को पति के साथ रहने के बजाय तनहाई में रहना पड़ रहा था. उस की उमंगे दम तोड़ती नजर आ रही थीं. केवल मोबाइल के जरिए ही उस की पति से बात हो पाती थी.

पुष्पा अपने मन की बात पति से बताती तो वह 1-2 दिन की छुट्टी ले कर घर आ जाता.  पुष्पा मन की पूरी बात भी नहीं कह पाती थी कि अनिल वापस जाने की बात करने लगता था, क्योंकि उसे अपनी ड्यूटी भी तो देखनी थी. हर बार पुष्पा उदास मन से उसे विदा करती. एक बार पुष्पा की उदासी देख कर अनिल ने अपने मांबाप से कहा कि वह पुष्पा को दिल्ली ले जाना चाहता है. मांबाप ने इजाजत दे दी तो वह उसे एक बार फिर दिल्ली ले गया.

पुष्पा अनिल के साथ उसी एक कमरे के घर में आ गई. वह मन लगाने की कोशिश करने लगी. अनिल ने सोचा कि धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा, लेकिन उसी बीच पुष्पा गर्भवती हो गई. पुष्पा ने यह खुशखबरी सास गायत्री को दी तो गायत्री को लगा कि ऐसी हालत में बहू को गांव आ जाना चाहिए, क्योंकि ऐसे में काफी देखभाल की जरूरत होती है. इसलिए गायत्री ने अनिल से कह दिया कि छुट्टी मिलने पर वह बहू को गांव छोड़ जाए.

कुछ दिनों बाद पुष्पा गांव आ गई. अब सास उस की देखभाल करने लगी. समय आने पर  पुष्पा ने बेटे को जन्म दिया. बेटे के जन्म के बाद घर में खुशी छा गई. अनिल भी फूला नहीं समा रहा था. बच्चे का नाम आयुष रखा गया.

घर में पोते के आ जाने से रामनिवास और गायत्री के दिन उस के साथ अच्छे से कटने लगे. उधर अनिल का भी मन करता कि बेटा उस की नजरों के सामने रहे, ताकि वह उसे प्यार कर सके. लेकिन ऐसा संभव नहीं था. वह महीने-दो महीने में घर आता और 1-2 दिन रह कर दिल्ली चला जाता.

रामनिवास का छोटा भाई वेदराम उस के घर से कुछ दूरी पर अपने परिवार के साथ रहता था. उस का बेटा रामखिलौने अविवाहित था. रामनिवास के तीनों बेटे दिल्ली में थे, इसलिए रामखिलौने जबतब ताऊ के घर आ जाता और घर के छोटेमोटे काम कर देता.

घर में किसी के न होने से पुष्पा भी रामखिलौने से ही अपनी जरूरत का सामान मंगवाती थी. वह जब भी उस के घर आता,  पुष्पा उसे चायनाश्ता करा देती थी. पुष्पा की नजदीकी रामखिलौने की जवान उमंगों को हवा दे रही थी, इसलिए उस का नजरिया भाभी के प्रति बदल रहा था. नजरिया बदला तो उस का वहां आनाजाना बढ़ गया.

एक दिन रामखिलौने ताऊ के घर आया तो पुष्पा अकेली थी. रामखिलौने को लगा कि भाभी से अपने दिल की बात कहने का यह अच्छा मौका है.  पुष्पा उस के लिए चाय बना कर लाई तो चाय पीते हुए उस ने कहा, ‘‘भाभी भैया कितना निर्दयी है कि उसे न तो तुम्हारी परवाह है और न ही छोटे से बच्चे की. बीवीबच्चे को यहां छोड़ कर वह दिल्ली में आराम से बैठा है.’’

इस के बाद रामखिलौने कुछ देर पुष्पा की तारीफ करता रहा. वह तो चला गया, पर उस की बातों ने पुष्पा के मन में चिंगारी लगा दी, जो धीरेधीरे सुलगने लगी थी. अब उसे अपनी जेठानी से जलन होने लगी, जो दिल्ली में अपने पति के पास रह रही थी. तनहाई के उन उदास दिनों में उसे लगने लगा कि रामखिलौने ही एक ऐसा आदमी है, जो उस के दर्द को समझता है.

एक दिन रामखिलौने आयुष के लिए कपड़े ले आया. पुष्पा के मना करने के बाद भी वह जबरदस्ती उसे थमा गया. अब वह आयुष के बहाने पुष्पा के नजदीक आने कोशिश करने लगा था. उस के जाने के बाद पुष्पा देर तक उस के बारे में सोचती रही. उसे लगा कि रामखिलौने अच्छा इंसान है, जो उस के बारे में चिंतित रहता है. जबकि पति को उस की जरा भी परवाह नहीं है. धीरेधीरे उस का झुकाव रामखिलौने की तरफ होने लगा.

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