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किस्मत के धनी ओमप्रकाश को फ्लोर मिल से भी जम कर मुनाफा हुआ. पैसा आया तो उन्हें पौलिटिक्स और पावर का भी चस्का लग गया. बिजनैसमैन तो संपर्क में थे ही, कुछ ही समय में उन्होंने नेताओं से ले कर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ भी उठनाबैठना शुरू कर दिया.

ऊंचे रसूखदार लोगों के संपर्क का भी उन्होंने खूब फायदा उठाया. देखते ही देखते श्यामदासानी परिवार की गिनती कानपुर शहर के अरबपति लोगों में होने लगी.

इसी अरबपति व्यवसाई ओमप्रकाश श्यामदासानी का बेटा था पीयूष श्यामदासानी. पीयूष बचपन से ही हठी था. वह जिस चीज की जिद करता, उसे हासिल कर के रहता था. पीयूष कानपुर के मशहूर ‘सर पदमपति सिंहानिया’ स्कूल में पढ़ा था.

पढ़ाई में वह भले ही कमजोर था, लेकिन उस के बचपन से शौक मंहगे थे. उसे लड़कियों से दोस्ती करना, उन्हें महंगे गिफ्ट देना तथा उन के साथ घूमनाफिरना अच्छा लगता था. बड़ी मुश्किल से पीयूष इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर पाया.

उस के बाद प्रोफैशनल डिप्लोमा कर के वह अपने परिवार के बिजनैस में हाथ बंटाने लगा. इसी दरम्यान उस ने बीयर, शराब पीना और हुक्का बारों में जाना शुरू कर दिया.

पीयूष के बंगले के पास ही एक जर्दा व्यापारी हरीश मखीजा का बंगला है. मनीषा मखीजा उन्हीं की बेटी है. यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही मनीषा की खूबसूरती में और ज्यादा निखार आ गया था. वह बहुत खूबसूरत थी. उस ने अंगरेजी माध्यम से शिक्षा ग्रहण की थी, इसलिए फर्राटेदार अंगरेजी बोलती थी.

बड़ी बेटी होने के नाते मातापिता उसे बहुत चाहते थे और उस की हर जिद, हर शौक पूरा करते थे. मांबाप के इसी लाड़प्यार ने उसे बिगाड़ दिया था. वह होटलों और क्लबों में जाने लगी थी. वह लेट नाइट पार्टियों से लौटती तो शैंपेन के नशे में होती थी.

एक रोज पीयूष और मनीषा की मुलाकात कानपुर क्लब में हुई. पहली ही नजर में दोनों एकदूसरे के दिल में उतर गए. उस रोज दोनों एक ही पार्टी में आए थे. देर रात तक दोनों पार्टी में एंजौय करते हुए हंसतेबतियाते रहे. जाते समय पीयूष बोला, ‘‘मनीषा, आई लव यू.’’

जवाब में मनीषा खिलखिला कर हंसी और उस ने भी कह दिया, ‘‘आई लव यू टू.’’

इस के बाद मनीषा और पीयूष का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों कभी रेस्टोरेंट में तो कभी क्लब में मिलने लगे. मनीषा पीयूष से मिलने अपनी कार से जाती थी. उस का ड्राइवर अवधेश उन दोनों के प्यार से वाकिफ था. इसलिए दोनों उसे टिप दे कर खुश रखते थे.

अवधेश कभीकभी कार से दोनों को हाईवे पर ले जाता था, जहां वह कार से निकल कर बाहर चला जाता था और मनीषा और पीयूष कार में ही रोमांस करते थे. कुछ ही समय में दोनों के बीच की सारी दूरियां मिट गईं. उन के बीच दिल और देह दोनों का नाता बन गया.

आंतरिक संबंध बने तो पीयूष चोरीछिपे मनीषा के बंगले पर भी जाने लगा. जरूरत पड़ने पर कभीकभी ड्राइवर अवधेश भी बंगले में घुसने के लिए पीयूष की मदद करता था. मनीषा तो पीयूष की दीवानी थी ही, उस के पहुंचते ही वह उस के गले का हार बन जाती थी.

कुंडली भले ही न मिली लेकिन जिस्म मिलते रहे

मनीषा और पीयूष के घर वालों को जब उन के प्यार की भनक लगी तो उन्होंने दोनों से बात की. इस पर दोनों ने घर वालों से कह दिया कि वे एकदूसरे से प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं. घर वालों ने उन की बात मान ली और वो उन की शादी करने को राजी हो गए.

लेकिन जब दोनों की कुंडली मिलवाई गई तो गुण आपस में नहीं मिले. फलस्वरूप पीयूष के घर वालों ने इस शादी से इंकार कर दिया. शादी की बात न बनने के बाद भी पीयूष और मनीषा का प्यार कम नहीं हुआ. उन के बीच संबंध पहले जैसे ही बने रहे.

नवंबर 2012 के दूसरे हफ्ते में मध्य प्रदेश के जबलपुर निवासी प्लास्टिक व्यापारी शंकर लाल अपनी बेटी ज्योति का रिश्ता ले कर ओमप्रकाश श्यामदासानी के पास आए. उन्होंने पीयूष और ज्योति की शादी की बात की तो ओमप्रकाश रिश्ता करने को राजी हो गए. लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि शादी कानपुर में ही होगी.

बेटी के लिए धनाढ्य और रसूखदार परिवार मिल रहा था, इसलिए शंकर लाल राजी हो गए. श्यामदासानी परिवार ज्योति को पसंद करने जबलपुर गया. खूबसूरत ज्योति को देख कर श्यामदासानी परिवार ने उसे बहू के रूप में पसंद कर लिया. इस के बाद जोरशोर से शादी की तैयारियां शुरू हो गईं.

शंकर लाल अपनी पत्नी कंचन के साथ शादी के एक सप्ताह पहले ही कानपुर आ गए. उन्हें पूरे परिवार सहित होटल रायल क्लिफ में ठहराया गया. उन्हें किसी चीज की कमी न हो, इस का खास खयाल रखा गया. अंतत: 28 नवंबर, 2012 को धूमधाम से स्टेटस क्लब में ज्योति और पीयूष का विवाह संपन्न हो गया.

इस विवाह समारोह में पौलिटिशियंस और ब्यूरोक्रेट्स से ले कर शहर के रसूखदार लोग शामिल हुए. शादी का समारोह इतना भव्य था कि जिस ने भी इस में शिरकत की, वह दंग रह गया. समारोह में जितने भी मेहमानों की फोटोग्राफ्स खींची गई थीं, समारोह के बाद उन्हें वह फोटोग्राफ्स बतौर उपहार दी गई थीं, जिन के पीछे पीयूष और ज्योति का नाम और विवाह समारोह की तारीख लिखी थी.

ज्योति दुलहन बन कर ससुराल आई तो सभी ने उस के रूपसौंदर्य की तारीफ की. चांद जैसी बहू पा कर पूनम तो अपने भाग्य को सराह रही थी. ज्योति भी अच्छा घर व पति पा कर खुश थी. लेकिन पीयूष इस शादी से खुश नहीं था. उस के मन में उथलपुथल मची हुई थी. शादी के बाद पीयूष और ज्योति हनीमून के लिए स्विटजरलैंड गए, जहां वे 12 दिन रहे.

कुछ महीने तक पीयूष नईनवेली दुलहन ज्योति के रूपजाल में उलझा रहा. फिर धीरेधीरे वह उस से कटने लगा. दरअसल, वह शादी के बाद भी अपने पहले प्यार को नहीं भुला पाया था और उस ने फिर से मनीषा से संबंध बना लिए थे. मनीषा बेलगाम थी, उसे घूमने और पार्टियों में जाने का शौक था.

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