25 वर्षीया सुमन सिंह अपने 3 साल के बेटे तनुष के साथ उत्तर प्रदेश के जिला गाजियाबाद के नंदग्राम में मंजू शर्मा के मकान में किराए पर रहती थी. उस के मकान का किराया 3 हजार रुपए महीना था. उस के पिता नत्थू सिंह अपनी पत्नी विमलेश और 4 बच्चों के साथ गाजियाबाद के इंद्रापुरम के न्यायखंड-3 में रहते थे.
नत्थू सिंह मूलरूप से मुरादनगर के रहने वाले थे. जहां वह चाट का ठेका लगाते थे. यह उन का पुश्तैनी धंधा था. गाजियाबाद आ कर भी उन्होंने अपने इसी काम को तरजीह दी और यहां वह अपना चाट का ठेला अपने एकलौते बेटे की मदद से न्यायखंड की मेन बाजार में लगाने लगे. यहां भी उन का धंधा बढि़या चल रहा था.
बच्चों में सुमन सब से बड़ी थी, इसलिए मांबाप की कुछ ज्यादा ही लाडली थी. लाड़प्यार से वह जिद्दी होने के साथसाथ बेलगाम भी हो गई थी. चाट के ठेले से इतनी कमाई नहीं होती थी कि नत्थू सिंह अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिला पाते. लेकिन ऐसा भी नहीं था कि उस के बच्चे अनपढ़ थे. जरूरत भर की शिक्षा उस ने सभी को दिला रखी थी.
कहा जाता है कि बेटी के सयानी होने की जानकारी मातापिता से पहले पड़ोसियों को हो जाती है. नत्थू सिंह की बेटी सुमन भी सयानी हो गई थी, बेटी वैसे ही जिद्दी और बेलगाम थी. कोई ऊंचनीच हो, नत्थू सिंह और विमलेश उस से पहले ही उस के हाथ पीले कर उसे विदा कर देना चाहते थे.
विमलेश ने जब इस बारे में नत्थू सिंह से बात की तो उस ने कहा, ‘‘मैं तो पूरा दिन घर से बाहर काम में लगा रहता हूं. अगर तुम्हीं कोई ठीकठाक लड़का देख कर शादी तय कर लो तो ज्यादा ठीक रहेगा. मेरे आनेजाने से नुकसान ही होगा.’’
इस तरह नत्थू सिंह ने यह जिम्मेदारी पत्नी पर डाल दी. विमलेश तेजतर्रार थी. इसलिए उस ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं ही कुछ करती हूं.’’
विमलेश ने कहा ही नहीं, बल्कि लड़के की तलाश भी शुरू कर दी. उस ने अपने तमाम रिश्तेदारों एवं परिचितों से सुमन के लायक लड़का बताने के लिए कह दिया.
विमलेश की यह कोशिश रंग लाई और जल्दी ही इस का सुखद नतीजा सामने आ गया. किसी से उसे पता चला कि गांव के रिश्ते की एक मौसी का एकलौता बेटा परवीन शादी लायक है. वह दिल्ली नगर निगम के उद्यान विभाग में माली था. उस के पिता सहदेव की मौत हो चुकी थी. यहां वह परिवार के साथ फरीदाबाद के लक्कड़पुर में रहता था.
सरकारी नौकरी वाला लड़का था, वेतन तो ठीकठाक था ही, उस के साथ भविष्य भी सुरक्षित था. यही सोच कर नत्थू सिंह और विमलेश ने परवीन के साथ सुमन की शादी फरवरी, 2008 में अपनी हैसियत के हिसाब से दहेज दे कर कर दी.
विदा हो कर सुमन ससुराल आ गई. तेजतर्रार, सपनों में जीने वाली सुमन ने जैसे पति की कामना की थी, परवीन उस का एकदम उलटा था. साधारण शक्लसूरत वाला परवीन बहुत ही सीधा था. वह न तो किसी से ज्यादा बातचीत करता था और न ही किसी से ज्यादा मेलजोल रखता था. अपने काम से काम रखने वाले परवीन का रवैया पत्नी के प्रति भी ऐसा ही था. शादी के बाद भी उस की इस आदत में कोई बदलाव नहीं आया तो सुमन परेशान रहने लगी.
सुमन तो अपनी ही तरह का खुशमिजाज पति चाहती थी, जो खुद भी हंसताबोलता रहे और दूसरों को भी बोलबोल कर हंसाता रहे. शाम को साथ घूमने जाने को कौन कहे, परवीन घर में भी सुमन से प्यार के 2 शब्द नहीं बोलता था. जब तक घर में रहता, मौनी बाबा की तरह चुप बैठा रहता. बोलता भी तो सिर्फ जरूरत भर की बात करता. पति की इस आदत से सुमन जल्दी ही ऊब गई.
सुमन को परवीन के साथ जिंदगी बोझ लगने लगी और घुटन सी होने लगी तो वह उसे छोड़ कर मायके आ गई. हालांकि अब तक वह परवीन के 2 बच्चों की मां बन चुकी थी. उस की 5 साल की बेटी तनु थी और 3 साल का बेटा तनुष. मात्र 6 साल ही उस का यह वैवाहिक संबंध चला था.
सुमन के घर वालों ने ही नहीं, परवीन के घर वालों ने भी बहुत कोशिश की कि परवीन और सुमन एक बार फिर साथ आ जाएं, लेकिन सुमन इस के लिए कतई तैयार नहीं हुई. दोनों बच्चे भी उसी के साथ थे. नत्थू सिंह का अपना छोटा सा मकान था, जिस में 9 लोग नहीं रह सकते थे. इस के अलावा सुमन को पता था कि मांबाप के घर से विदा होने के बाद अगर किसी वजह से बेटी वापस आ जाती है तो उसे पहले जैसा सम्मान नहीं मिलता.
सुमन के आने से रहने में तो परेशानी हो ही रही थी, मांबाप पर खर्च का बोझ भी बढ़ गया था. इसलिए अपने और बच्चों के गुजरबसर के लिए उस ने जोरशोर से नौकरी की तलाश शुरू कर दी. परिणामस्वरूप जल्दी ही उसे गाजियाबाद की एक गारमेंट फैक्टरी में ‘पैकर’ की नौकरी मिल गई. रोजीरोटी का जुगाड़ हो गया तो समस्या आई रहने की, क्योंकि उस छोटे से घर में उतने लोगों का रहना मुश्किल हो रहा था.
सुमन की मां विमलेश ने गाजियाबाद के ही नंदग्राम इलाके में रहने वाली अपनी एक मुंहबोली बहन बबिता उर्फ पारो से बात की तो उस ने अपनी जिम्मेदारी पर मंजू शर्मा के मकान में पहली मंजिल के हिस्से को 3 हजार रुपए महीने के किराए पर दिला दिया. सुमन उसी मकान में अपने 3 वर्षीय बेटे तनुष के साथ रहने लगी, जबकि बेटी मांबाप के साथ रहती थी.
सुमन की जिंदगी पटरी पर आ रही थी कि एकाएक उस की नौकरी चली गई, जिस से जिंदगी की गाड़ी एक बार फिर पटरी से उतर गई. सुमन के लिए यह बहुत बड़ा झटका था. नौकरी चली जाने से वह आर्थिक परेशानियों में घिर गई. अब उसे मकान का किराया भी देना पड़ रहा था मातापिता भी कब तक सहारा देते. संकट की इस घड़ी में एक बार फिर सहारा दिया मुंहबोली मौसी बबिता ने. उसी ने सुमन की दोस्ती धूकना गांव के रहने वाले राजीव त्यागी से करा दी, जो उस का पूरा खर्च उठाने लगा.
राजीव त्यागी के पिता सत्येंद्र त्यागी की नंदग्राम में बिजली के सामान की दुकान थी, जिसे बापबेटे मिल कर चलाते थे. दुकान ठीकठाक चलती थी, इसलिए राजीव के पास पैसों की कमी नहीं थी. पैसे वाला होने की वजह से सुमन का खर्च उठाने में उसे कोई दिक्कत नहीं हो रही थी.
राजीव और सुमन का लेनदेन का यह संबंध प्यार में बदला तो सुमन को लगने लगा कि राजीव उस से शादी कर लेगा. वह राजीव से शादी करना भी चाहती थी, क्योंकि राजीव ठीक वैसा था, जैसा पति वह चाहती थी. लेकिन वह राजीव की पत्नी बन पाती, उस के पहले ही 3 जून, 2014 को उस की हत्या हो गई.
रात 9 बजे के आसपास मकान मालकिन मंजू शर्मा किसी काम से पहली मंजिल पर गईं तो उन्होंने देखा, सुमन का कमरा खुला पड़ा है. उन्होंने कमरे में झांका तो दरवाजे के पास ही वह चित पड़ी दिखाई दी. उस की चुन्नी गले में लिपटी थी, इसलिए उन्हें समझते देर नहीं लगी कि उस की हत्या की गई है. उन्होंने इस बात की जानकारी पड़ोसियों को दे कर सुमन की हत्या की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दिला दी.