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शीला के अपहरण और हत्या के मामले में 4 लोगों को जेल तो भेज दिया गया, लेकिन उस के बारे में कुछ पता नहीं चला. उस की लाश भी बरामद नहीं हुई. शीला के गायब होने से अब वे लोग भी परेशान थे, जिन्हें जेल भेजा गया था. अब उन के घर वाले भी शीला की तलाश में लग गए, क्योंकि वे तभी जेल से बाहर आ सकते थे, जब शीला का कुछ पता चलता.

वे शीला की तलाश तो कर ही रहे थे, इस के अलावा उन्होंने गांव वालों तथा रिश्तेदारों की एक पंचायत भी बुलाई. इस पंचायत में श्रीनिवास तथा उस के गांव के भी 10-12 लोगों को बुलाया गया था. पंचायत में जेल भेजे गए लोगों के घर वालों ने शीला के चरित्र पर सवाल उठाते हुए किसी के साथ भाग जाने का आरोप लगाया तो श्रीनिवास भड़क उठा. उस ने शीला के जेठ और देवरों और देवरानी को शीला के अपहरण और हत्या को दोषी मानते हुए अपनी काररवाई को उचित ठहराया.

श्रीनिवास अपनी जिद पर अड़ा रहा तो 3-4 घंटों तक बातचीत चलने के बाद पंचायत बिना किसी फैसले के खत्म हो गई. जिस काम के लिए यह पंचायत बुलाई गई थी, वह वैसा का वैसा ही रह गया. जेल भेजे गए लोगों की रिहाई भी नहीं हो सकी. शीला के गायब होने से उस के घर तथा मायके वाले तो परेशान थे ही, उन के घर वाले भी परेशान थे, जो जेल भेजे गए थे.

सभी इस कोशिश में लगे थे कि कहीं से भी शीला का कोई सुराग मिल जाता. उन लोगों की कोशिश कोई रंग लाती, उस से पहले ही शीला के बारे में अपने आप पता चल गया. किसी ने फिरोजाबाद में रहने वाली शीला की बुआ महादेवी को फोन कर के बताया कि उन की भतीजी शीला का शव निबोहरा रोड से थोड़ा आगे सड़क से अंदर जा कर एक कंजी के पेड़ के नीचे पड़ा है.

इस खबर से महादेवी चौंकी. उस ने फोन अपने बेटे शीलू को पकड़ा दिया. शीलू ने उस से जानना चाहा कि वह कौन है और कहां से बोल रहा है तो उस ने फोन काट दिया. शीलू ने तुरंत यह बात श्रीनिवास को बताई और वह फोन नंबर भी लिखा दिया, जिस नंबर से फोन कर के यह बताया गया था.

श्रीनिवास वह नंबर देख कर चौंका, क्योंकि वह नंबर उस की बहन शीला का ही था. देर किए बगैर श्रीनिवास कुछ दोस्तों को साथ ले कर बहन की लाश की तलाश में बताए गए स्थान की ओर चल पड़ा. निबोहरा रोड 10 किलोमीटर के आसपास थी. इतनी बड़ी सड़क पर सड़क से थोड़ा अंदर जा कर कंजी का पेड़ तलाशना आसान नहीं था. श्रीनिवास दोस्तों के साथ शीला के शव की तलाश में घंटों लगा रहा.

काफी कोशिश के बाद भी उन्हें लाश नहीं मिली. अंत में निराश हो कर सब लौट पड़े. वे शमसाबाद चौराहे पर पहुंचे थे कि श्रीनिवास के मोबाइल पर फोन आया. उस ने नंबर देखा तो वह शीला का था. उस ने फोन रिसीव करने के साथ ही रिकौर्डिंग चालू कर दी, जिस से वह फोन करने वाले की बात रिकौर्ड कर सके.

फोन रिसीव होते ही दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘भाई साहब, आप लोग शीला की लाश जहां ढूंढ़ रहे थे, वह जगह तो काफी आगे है. शीला की लाश शमसाबाद चौराहे से निबोहरा रोड पर 2 किलोमीटर के अंदर ही पड़ी है.’’

‘‘भाई, तुम बोल कौन रहे हो? यह शीला का मोबाइल तुम्हें कहां से मिला? तुम्हें कैसे पता कि शीला की हत्या हो चुकी है और उस की लाश निबोहरा रोड पर थोड़ा अंदर जा कर कंजी के पेड़ के नीचे पड़ी है?’’ श्रीनिवास ने एक साथ कई सवाल पूछ लिए.

श्रीनिवास के सवालों का जवाब देने के बजाय दूसरी ओर से फोन काट दिया गया. निराश और थकेमांदे श्रीनिवास के अंदर इस दूसरे फोन ने जान डाल दी. एक बार फिर वह फोन पर बताई गई जगह पर जा कर लाश की तलाश करने लगा. आखिर उस की मेहनत रंग लाई और वह बदनसीब घड़ी आ गई, जिस का कोई भी भाई इंतजार नहीं करना चाहता.

लाश इस तरह सड़ चुकी थी कि पहचान में नहीं आ रही थी. श्रीनिवास ने अपनी मां और थाना शमसाबाद पुलिस को शीला की लाश मिलने की सूचना दे दी. तब थाना शमसाबाद पुलिस ने थाना फतेहाबाद पुलिस को सूचना देने को कहा, क्योंकि जहां शीला की लाश पड़ी थी, वह जगह थाना फतेहाबाद के अंतर्गत आती थी. तब श्रीनिवास ने 100 नंबर पर फोन कर के सारी बात बताई. इस के बाद जिला नियंत्रण कक्ष ने थाना फतेहाबाद के थानाप्रभारी मुनीष कुमार को सूचना दे कर तत्काल काररवाई का निर्देश दिया.

बेटी की लाश मिलने की सूचना पा कर रामदेवी भी घटनास्थल पर जा पहुंची. शक्लसूरत से वह भी लाश को नहीं पहचान सकी. तब उस ने बेटी की लाश कान के कुंडल, गले के मंगलसूत्र और साड़ी से पहचानी. अब तक थाना फतेहाबाद के प्रभारी मुनीष कुमार भी सहयोगियों के साथ वहां पहुंच गए थे.

लाश देख कर ही वह जान गए कि 3-4 दिनों पहले हत्या कर के इसे यहां ला कर फेंका गया है. क्योंकि वहां संघर्ष का कोई निशान नहीं था. जिस से साफ लगता था कि हत्या यहां नहीं की गई है. इस के अलावा लाश के पास तक मोटरसाइकिल के टायरों के आने और जाने के निशान भी थे.

लाश से इतनी तेज दुर्गंध आ रही थी कि वहां खड़ा होना मुश्किल हो रहा था. इसलिए पुलिस ने आननफानन में जरूरी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए आगरा के एस.एन. मैडिकल कालेज भिजवा दिया. इस के बाद थाना शमसाबाद पुलिस ने अपने यहां दर्ज शीला के अपहरण और हत्या का मुकदमा थाना फतेहाबाद पुलिस को स्थानांतरित कर दिया, जहां यह अपराध संख्या 183/2013 पर भादंवि की धाराओं 302, 201 के अंतर्गत दर्ज हुआ. मुकदमा दर्ज होते ही थानाप्रभारी मुनीष कुमार ने जांच शुरू कर दी. यह 3 अगस्त, 2013 की बात है.

मुनीष कुमार ने सब से पहले श्रीनिवास से पूछताछ की. उस ने शुरू से ले कर लाश बरामद होने तक की पूरी कहानी उन्हें सुना दी. उस की इस कहानी में मृतका शीला के मोबाइल फोन से उस की हत्या और लाश पड़ी होने की बताने वाली बात चौंकाने वाली थी, क्योंकि अकसर हत्या करने वाले मृतक का मोबाइल सिम निकाल कर फेंक देते हैं. जिस से वे पकड़े न जाएं. लेकिन यहां मामला अलग था. साफ था कि मृतका का मोबाइल जिस किसी के भी पास था, वह उस के हत्यारे को जानता होगा या खुद ही हत्यारा होगा.

यही सोच कर मुनीष कुमार ने उस नंबर को सर्विलांस टीम को सौंप दिया, क्योंकि इस नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन हत्यारे तक पहुंचा सकती थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार शीला की हत्या 31 जुलाई, 2013 की शाम को गला दबा कर की गई थी. लेकिन गला दबाने से पहले उसे कोई जहरीली चीज भी खिलाई गई थी. इस का मतलब शीला की हत्या उसी दिन हो गई थी, जिस दिन वह गायब हुई थी.

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